सुभाषित् लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सुभाषित् लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

सुभाषित्

सुभाषित्
अयंनिजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानान्तु वसुधैव कुटुम्बकम्।।

अर्थः- यह मेरा] यह पराया है। ऐसा छोटे हृदय वाले ही सोचते हैं। उदार हृदय वालों के लिये सारा विश्व ही परिवार के समान है।

सुभाषित्

सुभाषित्
रक्तं धनं च देशाय, संकटे यः प्रयच्छति ।
यज्ञाना सः सहस्त्राय, फले विन्दति सर्वथा।।

अर्थः- जो ब्यक्ति संकट में देश के लिये रक्त और धन देता है। वह ब्यक्ति सब प्रकार से हजार यज्ञों का फल प्राप्त करता है।

सुभाषित्

सुभाषित्
अश्वां नैव गजं नैव, ब्याघ्रा नैव च नैव च।
अजाः पुत्रं बलि दधात्, दैवो दुर्बल घातकः।।

अर्थः- घोड़े की नहीं , हाथी की नहीं, सिंह की तो कभी नहीं । बली हमेशा बकरी के बच्चे की ही दी जाती है।  अर्थात् देवता भी दुर्बल की सहायता नहीं करते ।

सुभाषित्

सुभाषित्
राष्ट्रयार्थे न यद् विद्या,  राष्ट्रयार्थे न यद् धनम् ।
राष्ट्रयार्थे न यद् शक्ति, धिक्-धिक् विद्या धनं बलम्।।

अर्थः- जो विद्या राष्ट्र के लिये नहीं है, जो धन राष्ट्र के लिये नहीं है, और जो बल राष्ट्र के लिये हितकर नहीं है। ऐसी विद्या, धन और बल को धिक्कार है।

लोकप्रिय पोस्ट

मेरी ब्लॉग सूची